Monday, May 27, 2019

فوائد عدم ارتداء ملابس رسمية في مكان العمل

نرغب جميعا في أن نتناغم مع الوسط المحيط بنا، وأن نكون جزءا لا يتجزأ من المجموعة التي ننتمي إليها، وخاصة في بيئة العمل، وهو ما يعني أننا نكرس وقتا ومالا، لمحاولة فهم ذلك الموضوع الشائك المتعلق بكشف النقاب عن كل القواعد الخفية المتعلقة بالملبس والسلوك.
ويقول ريك هاربو، الأستاذ المساعد لاقتصاديات الأعمال في كلية كيلي لإدارة الأعمال في جامعة إنديانا، إن امتثال المرء الكامل للقواعد السائدة في مكان العمل يشير إلى أنه "ذكي وينتمي" إلى ذلك المكان.
لكن هل يمكن أن يكون اتباع نهج أكثر تحررا أفضل؟
ومن هنا فإن التفرد بطابع مختلف عن المجموعة، لا التناغم والتشابه مع أفرادها، قد يشكل في واقع الأمر طريقا ذكيا لتحقيق النجاح. وفي دراسة نُشرت في دورية "بحوث المستهلك" عام 2014، كشفت عبارة "تأثير حذاء الرياضة أحمر اللون"، عن أننا نعتبر المختلفين عن المجموعة، أكثر كفاءة وأعلى مكانة ممن يمتثلون لعاداتها وأعرافها.
لذا، غالبا ما نشعر بأن من يرتدي ثيابا تختلف بشكل كبير عما هو متعارف عليه في بيئته العملية والمهنية، يتحلى بقدرات أفضل ومكانة أعلى واحترام أكبر، من زملائه الذين يمتثلون لقواعد الملبس.
ويعود ذلك إلى أن خروج المرء عن المألوف، يشير إلى أنه يتحلى بالاستقلالية وأن بمقدوره تحمل ثمن اختلافه عن المجموعة التي ينتمي إليها، حتى وإن كان ذلك سيكلفه عمله مثلاً.
وربما يجدر بنا هنا التعرف على رؤية سيلفيا بيليتسا، أستاذ مساعد في كلية كولومبيا لإدارة الأعمال في نيويورك، وهي من بين معدي الدراسة التي أشرنا إليها في السابق. تقول بيليتسا: "غالبا ما نرى أن ثمة ثمنا اجتماعيا للانحراف عن الأعراف الثقافية، أو نعتبر أن المضي على هذا الدرب يؤدي إلى عواقب سلبية لا إيجابية". لكنها تقول في الوقت نفسه إن هذا التصور ليس دقيقا في كل الحالات.
وتشير إلى أن الإقدام على المجازفات يشير إلى أن لدى الإنسان "رأس مال اجتماعيا" كافيا يضمن له الإبقاء على وضعه ومكانته، حتى إذا ما عاد عليه الاختلاف عن المجموع بنتائج عكسية.
وتشير بيليتسا إلى أن ذلك هو ما يجعل الموظفين الصغار - أو الجدد بالأحرى - يحاولون في أغلب الأحيان الانسجام مع الباقين في مجال العمل والتناغم معهم، بالنظر إلى أن المخاطر المترتبة على فشلهم في ذلك، تفوق تلك التي تواجه غيرهم.
وتضيف: "يهزأ الكثير من رجال الأعمال الناجحين بالأعراف السائدة، مثل مؤسس شركة آبل ستيف جوبز" الذي تخلى عن السترة من أجل ارتداء الكنزة ذات الرقبة سوداء اللون.
وبحسب بيليتسا، من الضروري أن يدرك الآخرون أننا نتعمد الخروج عن المألوف في ما يتعلق بالزي، لنضمن أن يحقق ذلك نتائج إيجابية. وضربت مثالا في هذا الشأن بالقول: "إذا ارتديت أحذية رياضية في مكان العمل - مثلا - قد يظن الآخرون أن ذلك يعود لكونك عاجزا عن شراء حذاء عادي. وهذه ليست بالسمة المميزة للشخص الناجح".
اللافت أن بعض النماذج المعروفة على صعيد التمرد على قواعد الزي في مكان العمل، يكونون من الرجال بيض البشرة على الأغلب. ومن بين هؤلاء، مارك زوكربيرغ مؤسس موقع "فيسبوك" بردائه المميز ذي القلنسوة وقميصه قصير الأكمام رمادي اللون، وكذلك المقدم التلفزيوني جون سنو الذي يعمل في محطة "تشانل فور" التليفزيونية البريطانية، بجواربه غير التقليدية وربطات عنقه صارخة الألوان.
لكن الأمر يختلف مع النساء، فحتى في المجالات التي تسود فيها قواعد أقل صرامة للملبس، مثل مجال التكنولوجيا، ستجد أن الكثير من السيدات اللواتي يشغلن مواقع مرموقة، مثل شيريل ساندبرغ، التي تعمل في شركة "فيسبوك"، ما زلن يرتدين ملابس تتسم بطابع رسمي وتقليدي أكبر.
وقد يعكس هذا الأمر ببساطة حقيقة أن الرجال يهيمنون بشكلٍ كبير على المناصب الرفيعة في الشركات والمؤسسات مُقارنة بالنساء والمنتمين للأقليات. لهذا السبب - وبحسب ما تقول أستريد هومان أستاذة علم النفس التنظيمي في جامعة أمستردام التي درست عواقب تبني سلوك ينتهك الأعراف والقواعد - توجد فرص أكبر للرجال بيض البشرة لكسر القواعد الراسخة.
وتشير كاثرين فيليبس، أستاذة في كلية كولومبيا لإدارة الأعمال، إلى أن هناك إمكانية لأن تواجه السيدات وأبناء الأقليات العرقية، ممن يعملون في مجالات هيمن عليها الرجال بيض البشرة على نحو تقليدي، ضغوطا أكبر للتناغم والانسجام مع المجموعات التي ينتمون إليها، نظرا لأنهم لا يتوافقون من الأصل مع هؤلاء.
وتقول فيليبس: "الكثير من النسوة وأبناء الأقليات العرقية يشعرون بأنهم بحاجة إلى ترسيخ أقدامهم والشعور بقدر كافٍ من الأمان، لكي يكرسوا طاقاتهم كاملة للعمل، وهو ما يجدونه عسيرا لأنهم يشعرون بالقلق من ألا يتم قبولهم" من الأصل من جانب المجموعة الموجودة في مكان عملهم.
وبطبيعة الحال، لا يسلم الرجال من التعرض لانتقادات لمخالفتهم الأعراف السائدة فيما يتعلق بالملبس. حدث ذلك مع المذيع روبرت باستون، المسؤول عن القسم الاقتصادي سابقا في "بي بي سي"، الذي جرى انتقاده لارتدائه ملابس تكشف عن شعر صدره، خلال مقابلة استضاف فيها وزير الخزانة البريطاني السابق جورج أوزبورن.

Tuesday, May 14, 2019

कमल हासन की टिप्पणी पर बहस, गोडसे हत्यारा या आतंकवादी

अभिनेता कमल हासन के एक बयान पर भारी विवाद खड़ा हो गया है.
कमल हासन ने रविवार को तमिलनाडु के अरवाकुरिची में एक चुनावी अभियान को संबोधित करते हुआ कहा था कि नथुराम गोडसे आज़ाद भारत के पहले अतिवादी थे और वो हिन्दू थे. कमल हासन ने तमिल भाषा ये बात कही थी और उन्होंने तीव्रवादी शब्द का इस्तेमाल किया था. हालांकि अंग्रेज़ी और हिन्दी मीडिया में अतिवादी की जगह आतंकवादी शब्द कमल हासन के हवाले से कहा जा रहा है.
तमिल में आतंकवाद के लिए भयंकरवादी शब्द होता है जिसका इस्तेमाल कमल हासन ने नहीं किया है.
जनसभा को संबोधित करते हुए कमल हासन ने कहा कि वो उन लोगों में से हैं जो विविधता में एकता पर भरोसा करते हैं और लोगों के बीच समानता की चाहत रखते हैं. हासन ने कहा, ''हमारे राष्ट्र ध्वज में तीन रंग हैं जो कि अलग-अलग मतों का प्रतिनिधित्व करते हैं पर एक साथ रहते हैं.''
कमल हासन की जनसभा मुस्लिम बहुल इलाक़े में थी. उन्होंने कहा, ''मैं ये बात इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मुस्लिम बहुल इलाक़े में हूं. मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यहां गांधी की प्रतिमा है. आज़ाद भारत का पहला अतिवादी हिन्दू था और उसका नाम नथुराम गोडसे था. यहीं से अतिवाद शुरू होता है. अच्छे भारतीय समानता की चाहत रखते हैं और तिरंगे में तीनों रंगों को साथ रखना चाहते हैं. मैं एक अच्छा भारतीय हूं और इसे मैं गर्व से कहता हूं.''
कमल हासन के इस बयान को लेकर कई लोगों ने आपत्ति जताई है. बॉलीवुड अभिनेता और बीजेपी समर्थक विवेक ओबेरॉय ने ट्वीट कर कहा है, ''प्रिय, कमल सर, आप एक महान कलाकार हैं. जिस तरह से कला का कोई धर्म नहीं होता है उसी तरह से आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. आप कह सकते हैं कि गोडसे आतंकवादी थे लेकिन अलग से 'हिन्दू' कहने की क्या ज़रूरत थी? क्या यह इसलिए है कि आप मुस्लिम बहुल इलाक़े में थे?''
विवेक ने अपने अगले ट्वीट में कहा है, ''सर, यह यह एक छोटे कलाकार की ओर से कही गई बात है. हम सब एक हैं और मुल्क को विभाजित न होने दें.''
अभिनेत्री कोयना मित्रा ने भी कमल हासन के बयान पर आपत्ति जताई है और ट्वीट कर कहा, ''कमल हासन सर, भारत के पहले आतंकवादी जिन्ना थे. उन्होंने मुस्लिमों के लिए देश को बाँटा और इसमें लाखों लोग मारे गए. आपको हत्यारे और आतंकवादी में फ़र्क़ पता होना चाहिए.''
कमल हासन की इस टिप्पणी पर समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमर सिंह ने ट्वीट कर लिखा है, ''कमल हासन को रेखा के पिता ने आगे बढ़ाया, जो कि हिन्दू थे. पहली और आख़िरी पत्नी भी हिन्दू थी. अब वो ज़हरीली टिप्पणी कर रहे हैं. निश्चित तौर पर गोडसे हत्यारा था लेकिन वो 26/11 की तरह नहीं था. सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं पर ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं.''
सीपीआईएमएल की नेता कविता कृष्णन ने कमल हासन का समर्थन किया है. कविता ने ट्वीट कर लिखा है, ''हां, जो कमल हासन कह रहे हैं उसका प्रमाण है. गोडसे भारत का पहला आतंकवादी था. गांधी की हत्या भारत में पहली आतंकी कार्रवाई थी. ऐसा आपने आरएसएस या बीजेपी नेताओं के मुंह से कभी नहीं सुना होगा. प्रज्ञा ठाकुर के संगठन अभिनव भारत गोडसे और सावरकर से प्रभावित रहे हैं.''
कमल हासन की इस टिप्पणी को पाकिस्तान के मीडिया में भी जगह मिली है. पाकिस्तानी न्यूज़ बेवसाइट द न्यूज़ ने कमल हासन के बयान लेकर लिखा है कि भारत के मशहूर फ़िल्मकार ने कहा कि भारत का पहला आतंकवादी हिन्दू था जिसने गांधी की हत्या की थी.
तमिलनाडु की बीजेपी अध्यक्ष तमिलिसाइ सुंदरराजन ने कमल हासन के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है. सुंदरराजन ने कहा, ''कमल हासन को कोई हक़ नहीं है कि वो पूरे हिन्दू समुदाय को बदनाम करें. कमल हासन को श्रीलंका की घटना नहीं याद आई जहां हाल ही में सैकड़ों की जान ले गई. वो ऐसा उपचुनाव में वोट लेने के लिए कर रहे हैं.''