Wednesday, June 26, 2019

पांच ख़ून, छह लोग और ग़लत सज़ा के वो 16 साल

एके जैन के मुताबिक़, आम आदमी के पास मुठभेड़ों पर सवाल उठाने और उनकी शिकायत करने के लिए कई मंच उपलब्ध हैं. इनकी वजह से न सिर्फ़ फ़र्ज़ी मुठभेड़ें कम हुई हैं बल्कि अपराधियों को सीधे मौत के घाट उतारने की बजाय उनके पैरों में गोली मारने का चलन भी बढ़ा है. एके जैन कहते हैं, "पहले की मुठभेड़ें तो आर या पार की लड़ाई जैसी होती थीं जिनमें या तो पुलिस को मरना है या फिर अपराधी को."
एसपी अजयपाल शर्मा अभी कुछ दिन पहले ही रामपुर गए हैं. इससे पहले वो प्रयागराज स्थित पुलिस मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक कार्मिक के रूप में तैनात थे. पुलिस वालों के बीच 'एनकाउंटरमैन' के नाम से मशहूर अजयपाल शर्मा ने क़रीब दो हफ़्ते पहले ही रामपुर में बतौर पुलिस कप्तान, पदभार संभाला था.
इस साल मार्च महीने में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही एक फ़ैसला पलटते हुए, छह लोगों को क़त्ल के आरोप से बरी कर दिया था. इससे पता चलता है कि नाइंसाफ़ी के इस ज़ुल्म ने उन छह लोगों और उनके परिवारों पर क्या असर डाला? और इस कहानी से भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था के बारे में क्या पता चलता है?
जिन पांच लोगों को सर्वोच्च अदालत ने बरी किया, उनमें से पांच लोगों ने जेल में गुज़ारे 16 बरसों में से 13 साल मौत की सज़ा के ख़ौफ़ में गुज़ारे. बरी किए गए लोगों में से छठवां एक नाबालिग़ था. पहले उस पर भी वयस्क के तौर पर मुक़दमा चला था और मौत की सज़ा सुनाई गई थी. लेकिन 2012 में जब ये साबित हो गया कि वो नाबालिग़ है और क़त्ल के वक़्त केवल 17 साल का था, तो उसे रिहा कर दिया गया था.
मौत की सज़ा पाने वाले ये लोग छोटी सी, अंधेरी बंद कोठरी में वक़्त गुज़ार रहे थे. फांसी का फंदा हर वक़्त उनके सिर पर लटकता रहता था. काल कोठरी के बाहर बल्ब की रोशनी लगातार उन्हें डराती रहती थी. कोठरी के इर्द-गिर्द पसरा सन्नाटा कई बार आस-पास रहने वाले क़ैदियों की चीख़ों से सिहर जाता था.
बरी किए गए छह लोगों में से एक ने कहा, ''मौत की सज़ा पाने के बाद उन्हें लगता था कि कोई काला नाग उनके सीने पर सवार है''.
एक दूसरे व्यक्ति ने कहा कि उसे रात में ''फांसी की सज़ा पाने वाले लोगों के भूत'' डराया करते थे. दिन में जब कुछ घंटों के लिए उन्हें काल-कोठरी से बाहर निकाला जाता था, तो, बाहर का मंज़र तो और भी डरावना लगता था.
उसे साथी क़ैदियों को दौरे पड़ते देखकर और भी डर लगता था. उनमें से एक क़ैदी ने तो ख़ुदकुशी कर ली थी. उस आदमी को लंबे वक़्त तक पेट के ज़ख़्म का दर्द सहना पड़ा. उस दौरान उसे कई बार तो मामूली इलाज मिल जाता था. पर, कई बार तो वो भी मुहैया नहीं कराया जाता था.
उस युवा व्यक्ति की सेहत की पड़ताल करने वाले दो डॉक्टरों ने बताया, ''वो मौत से डरने की बहुत ही अमानवीय परिस्थितियों में कई बरस तक रहा था''.
जिन छह लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया उनके नाम हैं- अंबादास लक्ष्मण शिंदे, बापू अप्पा शिंदे, अंकुश मारुति शिंदे, राज्य अप्पा शिंदे, राजू म्हासू शिंदे और सुरेश नागू शिंदे.
जब इन सब को मौत की सज़ा सुनाई गई थी, तो इनकी उम्र 17 से 30 बरस के बीच थी. इन्हें, वर्ष 2003 में महाराष्ट्र के नासिक में अमरूद तोड़ने वाले एक परिवार के पांच सदस्यों की एक बाग़ में हत्या के जुर्म में सज़ा सुनाई गई थी. इनमें से 17 साल का अंकुश मारुति शिंदे सबसे कम उम्र का सदस्य था.
-जून 2006 में पुणे की ज़िला अदालत ने सभी छह लोगों को मौत की सज़ा सुनाई.
-मार्च 2007 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी उनको दोषी माना, पर मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदल दिया.
-अप्रैल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील ख़ारिज की और सभी की मौत की सज़ा बहाल कर दी.
-अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका मंज़ूर की.
-मार्च 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही फ़ैसला पलटते हुए सभी छह दोषियों को बरी किया.
ये सभी लोग शिंदे नाम की घुमंतू आदिवासी जनजाति से ताल्लुक़ रखते हैं. ये भारत के सबसे ग़रीब समुदायों में से एक है. वो मिट्टी खोदते हैं. कचरा उठाते हैं. नालियां साफ़ करते हैं. और दूसरों के खेतों में काम कर के ज़िंदगी बसर करते हैं. तीन अदालतों के सात जजों ने 13 बरस के अंतराल में उन्हें मुज़रिम ठहराया.
और वो सारे के सारे जज ग़लत थे.
जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही फ़ैसला पलटते हुए इन सभी को बरी किया, तो वो एक ऐतिहासिक फ़ैसला कहा गया था. आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था, जब देश की सर्वोच्च अदालत ने मौत की सज़ा के अपने पुराने फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया था.
माननीय न्यायाधीशों ने अपने फ़ैसले में माना कि इन सभी छह लोगों को ग़लत तरीक़े से फंसाया गया था. अदालतों ने उन्हें दोषी मानने की भयंकर भूल की थी. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस मामले की 'न तो ईमानदारी से जांच हुई और न ही निष्पक्षता से मुक़दमा चलाया गया'. सुप्रीम कोर्ट ने 75 पन्नों के अपने असाधारण फ़ैसले में लिखा कि, 'इस मामले के असली अपराधी बच निकले'.
सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी लोगों की अपील को ख़ारिज करने के एक दशक बाद इन्हें बरी किया है.
माननीय न्यायाधीशों ने कहा कि इस मामले की तफ़्तीश में 'बहुत से अहम पहलुओं की अनदेखी हुई और पूरी तरह लापरवाही बरती गई'.
अदालत ने अपने फ़ैसले में लिखा है कि गड़बड़ी करने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए. अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने रिहा किए गए सभी लोगों को 5 लाख रुपए हर्ज़ाना एक महीने के भीतर अदा करने का आदेश भी दिया. अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से उनके 'पुनर्वास' के लिए ज़रूरी क़दम उठाने के लिए भी कहा. (जो जुर्माना अदालत ने तय किया वो जेल में बिताए हर महीने के बदले 2600 रुपए बैठते हैं)
जब मैं बरी किए गए इन छहों लोगों से महाराष्ट्र के जालना ज़िले के एक सूखाग्रस्त गांव भोकर्दन में मिला, तो वो डिप्रेशन और फ़िक्र के शिकार दिखे. इन छह लोगों में से दो सगे भाई हैं और बाक़ी सभी चचेरे भाई. तब तक इन्हें मुआवज़े की रक़म भी नहीं मिली थी.

Friday, June 14, 2019

متظاهرون سودانيون أمام البيت الأبيض

وتقول تاتاركو "لم يكن أشتون متحمساً للاستثمار في علامتنا التجارية فحسب، بل للمشاركة في عملنا قدر المستطاع. قدمنا برنامجا تجريبيا وكانت النتيجة طيبة للغاية، فقررنا إطلاق برنامج شارك فيه مشاهير مثل غوردون رامزي وأوليفيا مان".
ويقوم نحو 2.1 مليون متخصص في مجال التصميم الداخلي وتجديد المنازل بتقديم خدماتهم وتسويقها على منصة "هاوز". وتقول تاتاركو إن الموقع يساعد الشركات الصغيرة أيضا على النمو.
وتضيف "يتيح موقع هاوز للشركات الصغيرة منصة لعرض خدماتها، ليس على الصعيد المحلي فحسب، بل على مستوى العالم".
يلتقي المبعوث الأميركي الخاص للسودان، الخميس 16 يونيو/حزيران، كبار قادة المجلس العسكري الحاكم في الخرطوم للدفع نحو حل "سلمي" للخلاف القائم بين المحتجين والمجلس العسكري.
وأعلنت واشنطن، التي تطالب بحكم مدني في السودان، الأربعاء 12 يونيو/حزيران، تعيين موفد خاص لها في السودان، هو الدبلوماسي دونالد بوث.
ووصل بوث، الذي عمل سابقا موفدا إلى السودان وجنوب السودان، إلى الخرطوم برفقة مساعد وزير الخارجية المكلف أفريقيا، تيبور ناغي.
وذكر تحالف "قوى إعلان الحرية والتغيير" المنظم للاحتجاجات أن قادته قدموا إيجازا للمسؤولين الأميركيين حول الحاجة لتحقيق شفاف في اعتداءات 3 يونيو/حزيران.
كما طالبوا بانسحاب "الميلشيات" من شوارع الخرطوم والمدن الأخرى و"إنهاء قطع الإنترنت" وتأسيس إدارة مدنية لحكم البلاد، حسبما أعلنوا في بيان لهم.
وأنهى المحتجون عصيانهم المدني، مساء الثلاثاء 11 يونيو/حزيران، ووافقوا على عقد مباحثات جديدة مع المجلس العسكري الحاكم في أعقاب وساطة قادها رئيس الوزراء الإثيوبي، آبي أحمد.
وأفاد القيادي في حركة الاحتجاج، مدني عباس مدني، الصحافيين أن المسؤوليّن الأميركيين أبلغا قيادات الاحتجاج أن واشنطن "تدعم الوساطة الإثيوبية" للتوصل لحل.
ويطالب قادة الاحتجاج، إثر فض الاعتصام مطلع الشهر الجاري، بضمانات "دولية وإقليمية" لتنفيذه أي اتفاق جديد مع المجلس العسكري.
وأعلن المحتجون العصيان بعد أن فض مسلحون في زي عسكري بالقوة الاعتصام خارج مقر الجيش الاسبوع الفائت، ما أسفر عن مقتل العشرات.
ومن المقرر أن يسافر بوث وناغي إلى أديس أبابا لمناقشة الأزمة في السودان مع القيادة الإثيوبية وقادة الاتحاد الإفريقي.
وتسببت الأوضاع الاقتصادية السيئة في السودان في إشعال الاحتجاجات ضد حكم البشير في ديسمبر/كانون الأول 2018، قبل أن تتحول لموجة احتجاجات في أرجاء البلاد.
وانهارت المباحثات بين قادة المعارضة والمجلس العسكري الحاكم في منتصف مايو/أيار بسبب اختلاف الجانبين على من يقود المجلس السيادي، العسكريون أم المدنيون.
وتولى المجلس العسكري حكم السودان في أعقاب الإطاحة بالرئيس السوداني السابق، عمر البشير، في 11 نيسان/أبريل. وبدأ المحتجون اعتصاما أمام مقر قيادة الجيش في الخرطوم في 6 نيسان/أبريل الفائت.
وقتل نحو 120 شخصا منذ بدأت الحملة الأمنية، وفق لجنة الأطباء المركزية المؤيدة للاحتجاجات. من جهتها، تشير وزارة الصحة إلى مقتل 61 شخصا في أنحاء البلاد.
سنناقش معكم هذه المحاور وغيرها في حلقة الجمعة 14 يونيو /حزيران من برنامج نقطة حوار الساعة 16:06 جرينتش.