Tuesday, August 20, 2019

कभी बंदर तो कभी नीले कमल का तोहफ़ा

विक्रम का अपनी होने वाली पत्नी को उपहार देने का अंदाज़ सबसे अलग हुआ करता था.
अमृता शाह बताती हैं, "मृणालिनी ने एक बार हंसते हुए मुझसे कहा था मुझे उनसे कभी भी कोई सामान्य तोहफ़ा नहीं मिला. मेरी मंगनी पर उन्होंने करोड़पति होते हुए भी फ़िरोज़े की बहुत सस्ती लेकिन सुंदर तिब्बती अंगूठी दी थी."
"एक बार उन्होने श्रीलंका में पाए जाने वाला बंदर प्रजाति का 'स्लेंडर नोरिस' मुझे भिजवाया था जिसे लेने से मैंने साफ़ इनकार कर दिया था. शादी के दिन विक्रम ने तांबे की एक ट्रे पर बहुत ही दुर्लभ नीले रंग का कमल का फूल उन्हें भिजवाया था. किसी के प्रति प्यार का इससे सुंदर इज़हार हो ही नहीं सकता था."
विक्रम साराभाई बहुत मेहनत करते थे. वो वैज्ञानिक होने के साथ-साथ बहुत अच्छे प्रशासक भी थे. तनाव से मुक्ति के लिए वो हमेशा संगीत का सहारा लिया करते थे. कहा जाता है कि उनके पास रिकॉर्ड्स का बहुत ज़बरदस्त संग्रह था. कुंदनलाल सहगल उनके पसंदीदा गायक थे और उनका गाया गाना 'सो जा राजकुमारी' उन्हें बहुत पसंद था.
उन्हें सीटी बजाने का बहुत शौक था. उनके साथ काम करने वाले बताते हैं कि वो प्रयोगशाला में आ गए हैं, इसका पता उन्हें तब चलता था जब वो 'ब्रिज ऑन द रिवर क्वाए' की धुन की सीटी बजाते हुए सीढ़ियां चढ़ रहे होते थे और उनकी चप्पलों की आवाज़ गूंज रही होती थी.
मल्लिका साराभाई याद करती हैं, 'उन्हें शास्त्रीय पश्चिमी और भारतीय संगीत का बहुत शौक था. उनको टैगोर और सहगल के गाने बहुत पसंद थे."
विक्रम साराभाई अपने वज़न के प्रति बहुत जागरूक रहते थे. सुबह तड़के उठते थे. 12 बार सूर्य नमस्कार करते थे और मौका मिलने पर तैरते थे. घर पर खाने की मेज़ पर वो दही, अचार, पापड़ और सलाद के साथ सिर्फ़ एक रोटी खाया करते थे.
वो अक्सर दूसरों की प्लेट से एक निवाला उठा कर कहते थे, "ये मेरी प्लेट नहीं हैं. इसलिए इसकी कैलोरी मुझे नहीं चढ़ेगी."
मल्लिका साराभाई याद करती हैं, "वो एक बड़े फ़ूडी (खाने के शौक़ीन) थे. लेकिन हमेशा अपने वज़न का ध्यान रखते थे. हमेशा दुबले पतले और फ़िट रहने की कोशिश करते थे. उनको नए तरह के खाने खाने का शौक था. मेरी मां ने जब शादी की तो वो पूरी तरह से मांसाहारी थीं. उन्होंने न सिर्फ़ शाकाहारी परिवार में शादी की बल्कि शाकाहारी राज्य में भी शादी की."
"चूंकि पापा को खाने का बहुत शौक था, इसलिए मेरी मां अलग-अलग देशों की रेसेपी को शाकाहारी बना कर घर में बनाती थी. जब हम बच्चे थे तब से ही हमें मेक्सिकन और स्पेनिश खाने का स्वाद लग गया था. अब तो इटैलियन खाना हर जगह मिलता है लेकिन तब हमारा घर अकेला घर था जहां दुनिया भर के देशों के खाने बनाए जाते थे."
अपनी शादी के करीब 25 साल बाद उनका एक महिला कमला चौधरी से सम्बन्ध हो गया था, लेकिन उन्होंने उसे कभी छिपाया नहीं.
उनकी बेटी मल्लिका साराभाई बताती हैं, "पापा का कमला चौधरी से 'इनवॉल्वमेंट' था. उस समय मुझे बहुत दुख होता था और मैं उनसे बहुत बहस करती थी. जब मैं बड़ी हुई तब मुझे अंदाज़ा हुआ कि दो लोगों को प्यार करना संभव है."

Thursday, July 25, 2019

مركبة بيريغرين القمرية العائدة لشركة أستروبوتيك

د تنجح شركات مثل أستروبوتيك في أن تخطو الخطوات الأولى نحو بناء اقتصاد قمري قابل للديمومة، وذلك عن طريق توفير خدمات نقل للزبائن الأفراد ولمؤسسات مثل ناسا.
يقول الدكتور فيليب ميتزغر، عالم الكواكب في جامعة وسط فلوريدا في أورلاندو، "قد تكون لدينا في المستقبل جهات في الفضاء تنتج وقود الصواريخ وغيره من المواد وتوفر الخدمات. آنئذ لن يكون من الضروري أن تتحمل استثمارات ناسا وغيرها كل نفقات بناء تلك البنية التحتية الفضائية".
ومن المرجح أن تصبح السياحة الفضائية قريبا مصدر دخل آخر للاقتصاد القمري. ففي عام 2018، كشفت شركة SpaceX التي يملكها الملياردير إيلون ماسك عن هوية أول راكب ستنقله في رحلة حول القمر في عام 2023. قد تتأخر الرحلة عن ذلك الموعد، ولكن المسافر، وهو ملياردير ياباني دفع مبلغا لم يعلن عن حجمه للسفر بواسطة مركبة ماسك "الصقر الكبير (BFR)".
وإذا نظرنا إلى المستقبل البعيد، قد نرى أنه سيكون بإمكان السائحين الهبوط إلى سطح القمر والإقامة هناك في مبان تشيّد خصيصا لهذا الغرض. ويقدر بنك UBS بأن قطاع السياحة الفضائية قد يدر دخلا يبلغ نحو 3 مليارات دولار بحلول عام 2030.
ولكن أساس الاقتصاد القمري لا بد أن يكون التنقيب عن جليد الماء لاستخدامه في انتاج وقود الصواريخ. تتركز مخزونات هذا الجليد في قطبي القمر الشمالي والجنوبي، وهما منطقتان لا تصلهما أشعة الشمس. وقد تبلغ كميات هذه المخزونات مليارات الأطنان.
قد تؤدي فكرة تزويد المركبات بالوقود في القمر إلى خفض كلفة السفر في الفضاء، علاوة على خفض الكلفة الخاصة بفتح قاعدة دائمة على سطح القمر. وجاء في تقرير صدر عام 2018 أنه يمكن انتاج وقود الصواريخ في القمر بكلفة لا تتجاوز 500 دولار للكيلوغرام - وهو سعر يقل بعشرين ضعفا عن تكاليف نقل الوقود من الأرض إلى مدار حول القمر والتي تبلغ 10 آلاف دولار للكيلوغرام الواحد
ومن الممكن في المستقبل استخدام الوقود المنتج في القمر لزيادة ارتفاع الأقمار الاصطناعية التي تحلق في مدارات أرضية منخفضة إلى مدارات ثابتة أكثر ارتفاعا. فقد يكون من الممكن أن تلتحم مركبة قادمة من القمر وتحمل الوقود مع قمر اصطناعي يحلق في مدار أرضي منخفض مما سيمكن هذا القمر الاصطناعي من استخدام الوقود للارتفاع إلى مدار أعلى. وقد توّفر هذه العملية مبلغ 100 مليون دولار كل مرة.
ولكن الدكتور بول بيرن من جامعة نورث كارولاينا في مدينة رالي يقول إن تطوير اقتصاد قمري حقيقي سيستغرق وقتا طويلا، ويضيف "نعرف إلى أين نريد أن نتوجه، ولكن قد تمضي عدة عقود قبل أن يصبح ذلك مجديا بالكاد من الناحية التجارية، وحتى ذلك
تتكلّل خطة أرتميس في نهاية المطاف بإكمال العمل في عام 2028 في تشييد منشأة على سطح القمر، أي قاعدة للعمليات. ففي المراحل الأولى لاستيطان القمر، قد يكون الخيار الأفضل استخدام وحدات مصنوعة من عدة طبقات من القماش يمكن نفخها لإيواء القادمين.
فهذه الوحدات قابلة للطي، ولذا لن تأخذ مكانا كبيرا في الصواريخ الناقلة مقارنة بالوحدات الثابتة. وبمقدورها أيضا توفير مساحات أكبر عندما يتم نصبها. وتوّصلت وكالة الفضاء الأوروبية بالتعاون مع مكتب فوستر وشركاؤه المعماري إلى وضع تصميم هجين للوحدات السكنية هذه. ويشتمل التصميم على مكان إقامة ذي طابقين قابل للنفخ إضافة إلى وحدة صلبة تقوم مقام غرفة ضغط للدخول والخروج.
ولأجل حماية وحدات الإقامة هذه من المخاطر التي تسببها النيازك الصغيرة والإشعاعات، من الممكن استخدام روبوتات لإنتاج أغلفة صلبة بواسطة الطباعة ثلاثية الأبعاد تغلف بها وحدات الإقامة. وقد يكون من الممكن أيضا حتى استخدام "التراب" القمري كمادة للبناء. يقول فيليب ميتزغر "إنها طريقة سهلة للبناء لن تستغرق وقتا طويلا".
أما على المدى الأبعد، قد يتحول مستوطنو القمر للإقامة في أنفاق طبيعية تقع تحت السطح يقال لها "أنابيب الحمم". وتوفر هذه حماية طبيعية من مخاطر الإشعاعات.
طوّرت جامعة أريزونا نموذجا أوليا لبيت زجاجي تتم فيه زراعة محاصيل كالخس والطماطم والبطاطا باستخدام صمامات ثنائية باعثة للضوء (LEDs). وتمثل عملية انتاج المحاصيل في هذه البيوت دائرة مغلقة، حيث تتم فيها مداورة المياه المستخدمة لسقي المزروعات. وتسهم النباتات في عمل أنظمة إدامة الحياة عن طريق امتصاص غاز ثاني أكسيد الكربون من الهواء وانتاج غاز الأوكسجين.
كما صممت ناسا "شاحنة" نموذجية ذات 12 دولابا - ويطلق عليها اسم عربة استكشاف فضائية SEV - ليستخدمها الروّاد في تنقلاتهم واستكشافاتهم على سطح القمر.
ولكن قبل التمكن من استخراج الماء، ينبغي القيام بالكثير من أعمال التنقيب. وعندما يتم التعرف على وجود مخزونات واعدة، يمكن استخدام روبوتات لحفرها واستخراجها.
ويرى فيليب ميتزغر أنه يمكن تسخين الأتربة القمرية لاستخراج الماء منها على شكل بخار يجمع في ما بعد.
الحين يتوجب على الحكومات تحمل كل المصاريف

Wednesday, June 26, 2019

पांच ख़ून, छह लोग और ग़लत सज़ा के वो 16 साल

एके जैन के मुताबिक़, आम आदमी के पास मुठभेड़ों पर सवाल उठाने और उनकी शिकायत करने के लिए कई मंच उपलब्ध हैं. इनकी वजह से न सिर्फ़ फ़र्ज़ी मुठभेड़ें कम हुई हैं बल्कि अपराधियों को सीधे मौत के घाट उतारने की बजाय उनके पैरों में गोली मारने का चलन भी बढ़ा है. एके जैन कहते हैं, "पहले की मुठभेड़ें तो आर या पार की लड़ाई जैसी होती थीं जिनमें या तो पुलिस को मरना है या फिर अपराधी को."
एसपी अजयपाल शर्मा अभी कुछ दिन पहले ही रामपुर गए हैं. इससे पहले वो प्रयागराज स्थित पुलिस मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक कार्मिक के रूप में तैनात थे. पुलिस वालों के बीच 'एनकाउंटरमैन' के नाम से मशहूर अजयपाल शर्मा ने क़रीब दो हफ़्ते पहले ही रामपुर में बतौर पुलिस कप्तान, पदभार संभाला था.
इस साल मार्च महीने में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही एक फ़ैसला पलटते हुए, छह लोगों को क़त्ल के आरोप से बरी कर दिया था. इससे पता चलता है कि नाइंसाफ़ी के इस ज़ुल्म ने उन छह लोगों और उनके परिवारों पर क्या असर डाला? और इस कहानी से भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था के बारे में क्या पता चलता है?
जिन पांच लोगों को सर्वोच्च अदालत ने बरी किया, उनमें से पांच लोगों ने जेल में गुज़ारे 16 बरसों में से 13 साल मौत की सज़ा के ख़ौफ़ में गुज़ारे. बरी किए गए लोगों में से छठवां एक नाबालिग़ था. पहले उस पर भी वयस्क के तौर पर मुक़दमा चला था और मौत की सज़ा सुनाई गई थी. लेकिन 2012 में जब ये साबित हो गया कि वो नाबालिग़ है और क़त्ल के वक़्त केवल 17 साल का था, तो उसे रिहा कर दिया गया था.
मौत की सज़ा पाने वाले ये लोग छोटी सी, अंधेरी बंद कोठरी में वक़्त गुज़ार रहे थे. फांसी का फंदा हर वक़्त उनके सिर पर लटकता रहता था. काल कोठरी के बाहर बल्ब की रोशनी लगातार उन्हें डराती रहती थी. कोठरी के इर्द-गिर्द पसरा सन्नाटा कई बार आस-पास रहने वाले क़ैदियों की चीख़ों से सिहर जाता था.
बरी किए गए छह लोगों में से एक ने कहा, ''मौत की सज़ा पाने के बाद उन्हें लगता था कि कोई काला नाग उनके सीने पर सवार है''.
एक दूसरे व्यक्ति ने कहा कि उसे रात में ''फांसी की सज़ा पाने वाले लोगों के भूत'' डराया करते थे. दिन में जब कुछ घंटों के लिए उन्हें काल-कोठरी से बाहर निकाला जाता था, तो, बाहर का मंज़र तो और भी डरावना लगता था.
उसे साथी क़ैदियों को दौरे पड़ते देखकर और भी डर लगता था. उनमें से एक क़ैदी ने तो ख़ुदकुशी कर ली थी. उस आदमी को लंबे वक़्त तक पेट के ज़ख़्म का दर्द सहना पड़ा. उस दौरान उसे कई बार तो मामूली इलाज मिल जाता था. पर, कई बार तो वो भी मुहैया नहीं कराया जाता था.
उस युवा व्यक्ति की सेहत की पड़ताल करने वाले दो डॉक्टरों ने बताया, ''वो मौत से डरने की बहुत ही अमानवीय परिस्थितियों में कई बरस तक रहा था''.
जिन छह लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया उनके नाम हैं- अंबादास लक्ष्मण शिंदे, बापू अप्पा शिंदे, अंकुश मारुति शिंदे, राज्य अप्पा शिंदे, राजू म्हासू शिंदे और सुरेश नागू शिंदे.
जब इन सब को मौत की सज़ा सुनाई गई थी, तो इनकी उम्र 17 से 30 बरस के बीच थी. इन्हें, वर्ष 2003 में महाराष्ट्र के नासिक में अमरूद तोड़ने वाले एक परिवार के पांच सदस्यों की एक बाग़ में हत्या के जुर्म में सज़ा सुनाई गई थी. इनमें से 17 साल का अंकुश मारुति शिंदे सबसे कम उम्र का सदस्य था.
-जून 2006 में पुणे की ज़िला अदालत ने सभी छह लोगों को मौत की सज़ा सुनाई.
-मार्च 2007 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी उनको दोषी माना, पर मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदल दिया.
-अप्रैल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील ख़ारिज की और सभी की मौत की सज़ा बहाल कर दी.
-अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका मंज़ूर की.
-मार्च 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही फ़ैसला पलटते हुए सभी छह दोषियों को बरी किया.
ये सभी लोग शिंदे नाम की घुमंतू आदिवासी जनजाति से ताल्लुक़ रखते हैं. ये भारत के सबसे ग़रीब समुदायों में से एक है. वो मिट्टी खोदते हैं. कचरा उठाते हैं. नालियां साफ़ करते हैं. और दूसरों के खेतों में काम कर के ज़िंदगी बसर करते हैं. तीन अदालतों के सात जजों ने 13 बरस के अंतराल में उन्हें मुज़रिम ठहराया.
और वो सारे के सारे जज ग़लत थे.
जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही फ़ैसला पलटते हुए इन सभी को बरी किया, तो वो एक ऐतिहासिक फ़ैसला कहा गया था. आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था, जब देश की सर्वोच्च अदालत ने मौत की सज़ा के अपने पुराने फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया था.
माननीय न्यायाधीशों ने अपने फ़ैसले में माना कि इन सभी छह लोगों को ग़लत तरीक़े से फंसाया गया था. अदालतों ने उन्हें दोषी मानने की भयंकर भूल की थी. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस मामले की 'न तो ईमानदारी से जांच हुई और न ही निष्पक्षता से मुक़दमा चलाया गया'. सुप्रीम कोर्ट ने 75 पन्नों के अपने असाधारण फ़ैसले में लिखा कि, 'इस मामले के असली अपराधी बच निकले'.
सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी लोगों की अपील को ख़ारिज करने के एक दशक बाद इन्हें बरी किया है.
माननीय न्यायाधीशों ने कहा कि इस मामले की तफ़्तीश में 'बहुत से अहम पहलुओं की अनदेखी हुई और पूरी तरह लापरवाही बरती गई'.
अदालत ने अपने फ़ैसले में लिखा है कि गड़बड़ी करने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए. अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने रिहा किए गए सभी लोगों को 5 लाख रुपए हर्ज़ाना एक महीने के भीतर अदा करने का आदेश भी दिया. अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से उनके 'पुनर्वास' के लिए ज़रूरी क़दम उठाने के लिए भी कहा. (जो जुर्माना अदालत ने तय किया वो जेल में बिताए हर महीने के बदले 2600 रुपए बैठते हैं)
जब मैं बरी किए गए इन छहों लोगों से महाराष्ट्र के जालना ज़िले के एक सूखाग्रस्त गांव भोकर्दन में मिला, तो वो डिप्रेशन और फ़िक्र के शिकार दिखे. इन छह लोगों में से दो सगे भाई हैं और बाक़ी सभी चचेरे भाई. तब तक इन्हें मुआवज़े की रक़म भी नहीं मिली थी.

Friday, June 14, 2019

متظاهرون سودانيون أمام البيت الأبيض

وتقول تاتاركو "لم يكن أشتون متحمساً للاستثمار في علامتنا التجارية فحسب، بل للمشاركة في عملنا قدر المستطاع. قدمنا برنامجا تجريبيا وكانت النتيجة طيبة للغاية، فقررنا إطلاق برنامج شارك فيه مشاهير مثل غوردون رامزي وأوليفيا مان".
ويقوم نحو 2.1 مليون متخصص في مجال التصميم الداخلي وتجديد المنازل بتقديم خدماتهم وتسويقها على منصة "هاوز". وتقول تاتاركو إن الموقع يساعد الشركات الصغيرة أيضا على النمو.
وتضيف "يتيح موقع هاوز للشركات الصغيرة منصة لعرض خدماتها، ليس على الصعيد المحلي فحسب، بل على مستوى العالم".
يلتقي المبعوث الأميركي الخاص للسودان، الخميس 16 يونيو/حزيران، كبار قادة المجلس العسكري الحاكم في الخرطوم للدفع نحو حل "سلمي" للخلاف القائم بين المحتجين والمجلس العسكري.
وأعلنت واشنطن، التي تطالب بحكم مدني في السودان، الأربعاء 12 يونيو/حزيران، تعيين موفد خاص لها في السودان، هو الدبلوماسي دونالد بوث.
ووصل بوث، الذي عمل سابقا موفدا إلى السودان وجنوب السودان، إلى الخرطوم برفقة مساعد وزير الخارجية المكلف أفريقيا، تيبور ناغي.
وذكر تحالف "قوى إعلان الحرية والتغيير" المنظم للاحتجاجات أن قادته قدموا إيجازا للمسؤولين الأميركيين حول الحاجة لتحقيق شفاف في اعتداءات 3 يونيو/حزيران.
كما طالبوا بانسحاب "الميلشيات" من شوارع الخرطوم والمدن الأخرى و"إنهاء قطع الإنترنت" وتأسيس إدارة مدنية لحكم البلاد، حسبما أعلنوا في بيان لهم.
وأنهى المحتجون عصيانهم المدني، مساء الثلاثاء 11 يونيو/حزيران، ووافقوا على عقد مباحثات جديدة مع المجلس العسكري الحاكم في أعقاب وساطة قادها رئيس الوزراء الإثيوبي، آبي أحمد.
وأفاد القيادي في حركة الاحتجاج، مدني عباس مدني، الصحافيين أن المسؤوليّن الأميركيين أبلغا قيادات الاحتجاج أن واشنطن "تدعم الوساطة الإثيوبية" للتوصل لحل.
ويطالب قادة الاحتجاج، إثر فض الاعتصام مطلع الشهر الجاري، بضمانات "دولية وإقليمية" لتنفيذه أي اتفاق جديد مع المجلس العسكري.
وأعلن المحتجون العصيان بعد أن فض مسلحون في زي عسكري بالقوة الاعتصام خارج مقر الجيش الاسبوع الفائت، ما أسفر عن مقتل العشرات.
ومن المقرر أن يسافر بوث وناغي إلى أديس أبابا لمناقشة الأزمة في السودان مع القيادة الإثيوبية وقادة الاتحاد الإفريقي.
وتسببت الأوضاع الاقتصادية السيئة في السودان في إشعال الاحتجاجات ضد حكم البشير في ديسمبر/كانون الأول 2018، قبل أن تتحول لموجة احتجاجات في أرجاء البلاد.
وانهارت المباحثات بين قادة المعارضة والمجلس العسكري الحاكم في منتصف مايو/أيار بسبب اختلاف الجانبين على من يقود المجلس السيادي، العسكريون أم المدنيون.
وتولى المجلس العسكري حكم السودان في أعقاب الإطاحة بالرئيس السوداني السابق، عمر البشير، في 11 نيسان/أبريل. وبدأ المحتجون اعتصاما أمام مقر قيادة الجيش في الخرطوم في 6 نيسان/أبريل الفائت.
وقتل نحو 120 شخصا منذ بدأت الحملة الأمنية، وفق لجنة الأطباء المركزية المؤيدة للاحتجاجات. من جهتها، تشير وزارة الصحة إلى مقتل 61 شخصا في أنحاء البلاد.
سنناقش معكم هذه المحاور وغيرها في حلقة الجمعة 14 يونيو /حزيران من برنامج نقطة حوار الساعة 16:06 جرينتش.

Monday, May 27, 2019

فوائد عدم ارتداء ملابس رسمية في مكان العمل

نرغب جميعا في أن نتناغم مع الوسط المحيط بنا، وأن نكون جزءا لا يتجزأ من المجموعة التي ننتمي إليها، وخاصة في بيئة العمل، وهو ما يعني أننا نكرس وقتا ومالا، لمحاولة فهم ذلك الموضوع الشائك المتعلق بكشف النقاب عن كل القواعد الخفية المتعلقة بالملبس والسلوك.
ويقول ريك هاربو، الأستاذ المساعد لاقتصاديات الأعمال في كلية كيلي لإدارة الأعمال في جامعة إنديانا، إن امتثال المرء الكامل للقواعد السائدة في مكان العمل يشير إلى أنه "ذكي وينتمي" إلى ذلك المكان.
لكن هل يمكن أن يكون اتباع نهج أكثر تحررا أفضل؟
ومن هنا فإن التفرد بطابع مختلف عن المجموعة، لا التناغم والتشابه مع أفرادها، قد يشكل في واقع الأمر طريقا ذكيا لتحقيق النجاح. وفي دراسة نُشرت في دورية "بحوث المستهلك" عام 2014، كشفت عبارة "تأثير حذاء الرياضة أحمر اللون"، عن أننا نعتبر المختلفين عن المجموعة، أكثر كفاءة وأعلى مكانة ممن يمتثلون لعاداتها وأعرافها.
لذا، غالبا ما نشعر بأن من يرتدي ثيابا تختلف بشكل كبير عما هو متعارف عليه في بيئته العملية والمهنية، يتحلى بقدرات أفضل ومكانة أعلى واحترام أكبر، من زملائه الذين يمتثلون لقواعد الملبس.
ويعود ذلك إلى أن خروج المرء عن المألوف، يشير إلى أنه يتحلى بالاستقلالية وأن بمقدوره تحمل ثمن اختلافه عن المجموعة التي ينتمي إليها، حتى وإن كان ذلك سيكلفه عمله مثلاً.
وربما يجدر بنا هنا التعرف على رؤية سيلفيا بيليتسا، أستاذ مساعد في كلية كولومبيا لإدارة الأعمال في نيويورك، وهي من بين معدي الدراسة التي أشرنا إليها في السابق. تقول بيليتسا: "غالبا ما نرى أن ثمة ثمنا اجتماعيا للانحراف عن الأعراف الثقافية، أو نعتبر أن المضي على هذا الدرب يؤدي إلى عواقب سلبية لا إيجابية". لكنها تقول في الوقت نفسه إن هذا التصور ليس دقيقا في كل الحالات.
وتشير إلى أن الإقدام على المجازفات يشير إلى أن لدى الإنسان "رأس مال اجتماعيا" كافيا يضمن له الإبقاء على وضعه ومكانته، حتى إذا ما عاد عليه الاختلاف عن المجموع بنتائج عكسية.
وتشير بيليتسا إلى أن ذلك هو ما يجعل الموظفين الصغار - أو الجدد بالأحرى - يحاولون في أغلب الأحيان الانسجام مع الباقين في مجال العمل والتناغم معهم، بالنظر إلى أن المخاطر المترتبة على فشلهم في ذلك، تفوق تلك التي تواجه غيرهم.
وتضيف: "يهزأ الكثير من رجال الأعمال الناجحين بالأعراف السائدة، مثل مؤسس شركة آبل ستيف جوبز" الذي تخلى عن السترة من أجل ارتداء الكنزة ذات الرقبة سوداء اللون.
وبحسب بيليتسا، من الضروري أن يدرك الآخرون أننا نتعمد الخروج عن المألوف في ما يتعلق بالزي، لنضمن أن يحقق ذلك نتائج إيجابية. وضربت مثالا في هذا الشأن بالقول: "إذا ارتديت أحذية رياضية في مكان العمل - مثلا - قد يظن الآخرون أن ذلك يعود لكونك عاجزا عن شراء حذاء عادي. وهذه ليست بالسمة المميزة للشخص الناجح".
اللافت أن بعض النماذج المعروفة على صعيد التمرد على قواعد الزي في مكان العمل، يكونون من الرجال بيض البشرة على الأغلب. ومن بين هؤلاء، مارك زوكربيرغ مؤسس موقع "فيسبوك" بردائه المميز ذي القلنسوة وقميصه قصير الأكمام رمادي اللون، وكذلك المقدم التلفزيوني جون سنو الذي يعمل في محطة "تشانل فور" التليفزيونية البريطانية، بجواربه غير التقليدية وربطات عنقه صارخة الألوان.
لكن الأمر يختلف مع النساء، فحتى في المجالات التي تسود فيها قواعد أقل صرامة للملبس، مثل مجال التكنولوجيا، ستجد أن الكثير من السيدات اللواتي يشغلن مواقع مرموقة، مثل شيريل ساندبرغ، التي تعمل في شركة "فيسبوك"، ما زلن يرتدين ملابس تتسم بطابع رسمي وتقليدي أكبر.
وقد يعكس هذا الأمر ببساطة حقيقة أن الرجال يهيمنون بشكلٍ كبير على المناصب الرفيعة في الشركات والمؤسسات مُقارنة بالنساء والمنتمين للأقليات. لهذا السبب - وبحسب ما تقول أستريد هومان أستاذة علم النفس التنظيمي في جامعة أمستردام التي درست عواقب تبني سلوك ينتهك الأعراف والقواعد - توجد فرص أكبر للرجال بيض البشرة لكسر القواعد الراسخة.
وتشير كاثرين فيليبس، أستاذة في كلية كولومبيا لإدارة الأعمال، إلى أن هناك إمكانية لأن تواجه السيدات وأبناء الأقليات العرقية، ممن يعملون في مجالات هيمن عليها الرجال بيض البشرة على نحو تقليدي، ضغوطا أكبر للتناغم والانسجام مع المجموعات التي ينتمون إليها، نظرا لأنهم لا يتوافقون من الأصل مع هؤلاء.
وتقول فيليبس: "الكثير من النسوة وأبناء الأقليات العرقية يشعرون بأنهم بحاجة إلى ترسيخ أقدامهم والشعور بقدر كافٍ من الأمان، لكي يكرسوا طاقاتهم كاملة للعمل، وهو ما يجدونه عسيرا لأنهم يشعرون بالقلق من ألا يتم قبولهم" من الأصل من جانب المجموعة الموجودة في مكان عملهم.
وبطبيعة الحال، لا يسلم الرجال من التعرض لانتقادات لمخالفتهم الأعراف السائدة فيما يتعلق بالملبس. حدث ذلك مع المذيع روبرت باستون، المسؤول عن القسم الاقتصادي سابقا في "بي بي سي"، الذي جرى انتقاده لارتدائه ملابس تكشف عن شعر صدره، خلال مقابلة استضاف فيها وزير الخزانة البريطاني السابق جورج أوزبورن.

Tuesday, May 14, 2019

कमल हासन की टिप्पणी पर बहस, गोडसे हत्यारा या आतंकवादी

अभिनेता कमल हासन के एक बयान पर भारी विवाद खड़ा हो गया है.
कमल हासन ने रविवार को तमिलनाडु के अरवाकुरिची में एक चुनावी अभियान को संबोधित करते हुआ कहा था कि नथुराम गोडसे आज़ाद भारत के पहले अतिवादी थे और वो हिन्दू थे. कमल हासन ने तमिल भाषा ये बात कही थी और उन्होंने तीव्रवादी शब्द का इस्तेमाल किया था. हालांकि अंग्रेज़ी और हिन्दी मीडिया में अतिवादी की जगह आतंकवादी शब्द कमल हासन के हवाले से कहा जा रहा है.
तमिल में आतंकवाद के लिए भयंकरवादी शब्द होता है जिसका इस्तेमाल कमल हासन ने नहीं किया है.
जनसभा को संबोधित करते हुए कमल हासन ने कहा कि वो उन लोगों में से हैं जो विविधता में एकता पर भरोसा करते हैं और लोगों के बीच समानता की चाहत रखते हैं. हासन ने कहा, ''हमारे राष्ट्र ध्वज में तीन रंग हैं जो कि अलग-अलग मतों का प्रतिनिधित्व करते हैं पर एक साथ रहते हैं.''
कमल हासन की जनसभा मुस्लिम बहुल इलाक़े में थी. उन्होंने कहा, ''मैं ये बात इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मुस्लिम बहुल इलाक़े में हूं. मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यहां गांधी की प्रतिमा है. आज़ाद भारत का पहला अतिवादी हिन्दू था और उसका नाम नथुराम गोडसे था. यहीं से अतिवाद शुरू होता है. अच्छे भारतीय समानता की चाहत रखते हैं और तिरंगे में तीनों रंगों को साथ रखना चाहते हैं. मैं एक अच्छा भारतीय हूं और इसे मैं गर्व से कहता हूं.''
कमल हासन के इस बयान को लेकर कई लोगों ने आपत्ति जताई है. बॉलीवुड अभिनेता और बीजेपी समर्थक विवेक ओबेरॉय ने ट्वीट कर कहा है, ''प्रिय, कमल सर, आप एक महान कलाकार हैं. जिस तरह से कला का कोई धर्म नहीं होता है उसी तरह से आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. आप कह सकते हैं कि गोडसे आतंकवादी थे लेकिन अलग से 'हिन्दू' कहने की क्या ज़रूरत थी? क्या यह इसलिए है कि आप मुस्लिम बहुल इलाक़े में थे?''
विवेक ने अपने अगले ट्वीट में कहा है, ''सर, यह यह एक छोटे कलाकार की ओर से कही गई बात है. हम सब एक हैं और मुल्क को विभाजित न होने दें.''
अभिनेत्री कोयना मित्रा ने भी कमल हासन के बयान पर आपत्ति जताई है और ट्वीट कर कहा, ''कमल हासन सर, भारत के पहले आतंकवादी जिन्ना थे. उन्होंने मुस्लिमों के लिए देश को बाँटा और इसमें लाखों लोग मारे गए. आपको हत्यारे और आतंकवादी में फ़र्क़ पता होना चाहिए.''
कमल हासन की इस टिप्पणी पर समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमर सिंह ने ट्वीट कर लिखा है, ''कमल हासन को रेखा के पिता ने आगे बढ़ाया, जो कि हिन्दू थे. पहली और आख़िरी पत्नी भी हिन्दू थी. अब वो ज़हरीली टिप्पणी कर रहे हैं. निश्चित तौर पर गोडसे हत्यारा था लेकिन वो 26/11 की तरह नहीं था. सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं पर ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं.''
सीपीआईएमएल की नेता कविता कृष्णन ने कमल हासन का समर्थन किया है. कविता ने ट्वीट कर लिखा है, ''हां, जो कमल हासन कह रहे हैं उसका प्रमाण है. गोडसे भारत का पहला आतंकवादी था. गांधी की हत्या भारत में पहली आतंकी कार्रवाई थी. ऐसा आपने आरएसएस या बीजेपी नेताओं के मुंह से कभी नहीं सुना होगा. प्रज्ञा ठाकुर के संगठन अभिनव भारत गोडसे और सावरकर से प्रभावित रहे हैं.''
कमल हासन की इस टिप्पणी को पाकिस्तान के मीडिया में भी जगह मिली है. पाकिस्तानी न्यूज़ बेवसाइट द न्यूज़ ने कमल हासन के बयान लेकर लिखा है कि भारत के मशहूर फ़िल्मकार ने कहा कि भारत का पहला आतंकवादी हिन्दू था जिसने गांधी की हत्या की थी.
तमिलनाडु की बीजेपी अध्यक्ष तमिलिसाइ सुंदरराजन ने कमल हासन के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है. सुंदरराजन ने कहा, ''कमल हासन को कोई हक़ नहीं है कि वो पूरे हिन्दू समुदाय को बदनाम करें. कमल हासन को श्रीलंका की घटना नहीं याद आई जहां हाल ही में सैकड़ों की जान ले गई. वो ऐसा उपचुनाव में वोट लेने के लिए कर रहे हैं.''

Friday, April 5, 2019

ماهو سر زيارة نتنياهو المفاجئة إلى موسكو؟

ناقشت صحف عربية بنسختيها الورقية والالكترونية الزيارة المفاجئة التي يقوم بها رئيس الوزراء الإسرائيلي بنيامين نتنياهو اليوم الخميس إلى موسكو.
وتساءلت الصحف العربية عن السبب الذي دفع نتنياهو لمغادرة إسرائيل اثناء المعركة الانتخابية وقبل أربعة أيام فقط من إجراء الانتخابات.
يقول محمد النوباني في رأي اليوم اللندنية إن زيارة نتنياهو الحالية "تحمل الرقم ١٣ منذ العام ٢٠١٥ والثانية منذ السابع والعشرين من شباط/ فبراير الماضي"، مؤكداً أن "المنافسة الحامية والمفتوحة على احتمال خسارة الليكود لأغلبيته البرلمانية وبالتالي على خسارة نتنياهو لمنصبه كانت تتطلب بقاءه في الكيان الاسرائيلي لإدارة المراحل النهائية من الدعاية الانتخابية، فما الخطب أو الأمر الجلل الذي دفعه للقيام بهذه الزيارة المفاجئة للأوساط الدبلوماسية وللمراقبين السياسيين على حد سواء؟"
ويضيف الكاتب أن هناك عدة أسباب محتملة خلف هذه الزيارة منها "أنه ربما يذهب إلى موسكو لأخذ موافقة بوتين على توجيه ضربة عسكرية قوية للقوات الايرانية وللمستشارين الايرانيين... أو أن يكون توقيت الزيارة له علاقة باستقطاب أصوات الناخبين الروس في إسرائيل... أو أن تكون الزيارة بإيعاز من ترامب للقيام بوساطة مع الروس يتم بموجبها تخلي الروس عن معارضتهم لضم الجولان لإسرائيل مقابل تنازل أمريكي ما للروس بخصوص فنزويلا".
وتقول الصحيفة ذاتها في افتتاحيتها إن أسباب الزيارة تكمن في "محاولة نتنياهو الإيحاء للناخب الإسرائيلي أنّه رجل دولة ويُقيم علاقات وثيقة مع رئيسيّ القوّتين العُظميين الأمريكي والروسي ... وأنه يُدرك أن مايو/ أيار المقبل، الذي يشهد تطبيق المرحلة الثّانية والأهم من العُقوبات الأمريكيّة على إيران، ربّما يكون شهر الحرب".
وتضيف الصحيفة "نتنياهو يريد تحقيق هدفين أساسيين في الوقت الراهن، البقاء في الحكومة وتجنب الذهاب إلى السجن بتهم الفساد، وقد يجد التصعيد العسكري، أو التلويح به، وكسب بوتين إلى جانبه هو أقصر الطّرق لتحقيق هذين الهدفين".
وتحت عنوان "خطة نتنياهو لحل الأزمة السورية على طاولة بوتين"، تقول العرب اللندنية "روسيا تدرك أنه ليس بالإمكان نجاح أي تسوية في سوريا دون الأخذ بعين الاعتبار هواجس إسرائيل الأمنية".
وتضيف الصحيفة "كثيرون يتساءلون هل سينضم الرئيس الروسي فلاديمير بوتين إلى نظيره الأمريكي دونالد ترامب في تقديم هدية لرئيس الوزراء الإسرائيلي بنيامين نتنياهو قبيل أيام من الانتخابات الإسرائيلية، وهل ستكون الهدية، الإعلان صراحة عن ضرورة انسحاب القوات الإيرانية من الأراضي السورية؟"
كما كتب إبراهيم حاج عبدي مقالاً في موقع إرم نيوز بعنوان "ما هو سر زيارة نتنياهو إلى موسكو للمرة الثانية خلال شهر؟" يقول فيه إن الزيارة المفاجئة "تعزز صحة التقارير التي تحدثت عن وجود خطة إسرائيلية محتملة لتسوية النزاع السوري، قد تشترك واشنطن في ترتيبها إلى جانب موسكو وتل أبيب".
ويضيف عبدي "ومن المستبعد، بحسب خبراء، أن تكون لدى إسرائيل، التي تعد جزءًا من المشكلة في المنطقة، خطة لتسوية شاملة في سوريا، لكن التسريبات ترجح وجود "خطة جزئية" تتعلق بالوجود الإيراني في سوريا، خاصة في المنطقة الجنوبية القريبة من حدود إسرائيل".
ويؤكد الكاتب أن "الوجود الإيراني في سوريا مزعج، بالطبع، لكل من إسرائيل وأمريكا، إلا أن الجديد، هنا، هو أن موسكو قد تتفق معهما في الجانب المتعلق بالوجود الإيراني، خاصة أن الكرملين لمّح مرارًا إلى ضرورة مغادرة جميع القوات والمليشيات الأجنبية من سوريا، وهو ما يشمل، ضمنا، إيران التي لعبت دورًا عسكريًا كبيرًا في النزاع السوري".
وحول خطة التسوية في سوريا المزمع مناقشتها خلال لقاء نتنياهو وبوتين، تقول الشرق الأوسط اللندنية "ومع تمهيد الكرملين للمحادثات مع نتنياهو بإعلان استعداد روسيا لمناقشة الخطة الإسرائيلية للتسوية، تستعد روسيا لاستقبال الرئيس التركي رجب طيب أردوغان الاثنين المقبل، في زيارة ينتظر أن تركز على ملفات معقدة، بينها الوضع في إدلب وخطة إقامة منطقة أمنية في الشمال السوري".
وترجح الجريدة أن تتركز المباحثات على "آليات تعزيز التنسيق، خصوصاً في مجال الاتصالات العسكرية في سوريا على خلفية الضربات الإسرائيلية الأخيرة على مواقع في حلب".